तुकड्यादास

Tukdoji Maharaj
भारत रत्न सम्मान अभियान

राष्ट्रसंत तुकडोजी महाराज भारत रत्न सम्मान अभियान

वंदनीय राष्ट्रसंत श्री तुकडोजी महाराज जी ने समाज सुधार, ग्राम विकास, जनजागरण, आध्यात्मिकता एवं राष्ट्रसेवा के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान दिया। उनके महान विचारों और कार्यों को सम्मान दिलाने की इस जन-पहल में सहभागी बनें।

आइए, हम सब मिलकर वंदनीय राष्ट्रसंत श्री तुकडोजी महाराज जी को भारत रत्न प्रदान करने की इस पहल का समर्थन करें।

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तुकडोजी महाराज का जीवन एक प्रेरणादायक और अद्वितीय उदाहरण है, जो सामाजिक सुधार, अध्यात्म, और राष्ट्रसेवा को समर्पित था। उनका जन्म 30 अप्रैल 1909 को महाराष्ट्र के अमरावती जिले के यावली गांव में हुआ था। उनका मूल नाम माणिक बंडोजी इंगले था, लेकिन बाद में वे तुकडोजी महाराज के नाम से प्रसिद्ध हुए। बचपन से ही उनका झुकाव आध्यात्मिकता और साधना की ओर था।

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वंदनीय राष्ट्रसंत श्री तुकडोजी महाराज पुण्यतिथि महोत्सव का गुरुकुंज मोझरी में शुभारंभ!वंदनीय राष्ट्रसंत श्री तुकडोजी महाराज पुण्यतिथि महोत्सव का गुरुकुंज मोझरी में शुभारंभ!

परम वंदनीय राष्ट्रसंत श्री तुकडोजी महाराज जी की पावन स्मृतियों को नमन करते हुए, उनकी पुण्यतिथि महोत्सव का शुभारंभ पावन तीर्थक्षेत्र गुरुकुंज मोझरी में हुआ है। राष्ट्रसंत तुकडोजी महाराज जी ने अपने भजनों, ग्रामगीता और समाजसेवा के माध्यम से मानवता, राष्ट्रभक्ति, ग्रामविकास तथा सामाजिक एकता का अमूल्य संदेश दिया। उनके विचार आज भी समाज को सदाचार, सेवा, समता और मानवकल्याण के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देते हैं। आइए, इस पावन अवसर पर हम सभी उनके विचारों को अपने जीवन में अपनाने तथा उनके बताए सेवा और मानवता के मार्ग पर चलने का संकल्प लें।

सामुदायिक प्रार्थना

है प्रार्थना गुरुदेव से ,यह स्वर्ग सम संसार हो। अति उच्चतम जीवन बने, परमार्थमय व्यवहार हो।।

ना हम रहे अपने लिए , हम को सभी से गर्ज है। गुरुदेव यह आशीष दो ,जो सोचने का फर्ज है।। ।।1।।

हम हो पुजारी तत्व के, गुरुदेव के आदेश के। सच प्रेम के नित नेम के, सत धर्म के सत्कर्म के।।

हो चीड़ झूठी राह की , अन्याय की अभिमान की। सेवा करण को दास की ,परवाह नहीं हो जान की।।।।2।।

छोटे ना हो हम बुद्धि से, हो विश्वमय से ईशमय। हो प्रेममय अरु ग्यानमय ,जगदेवमय जगदीशमय।।

हर इंद्रियों पर ताव कर, हम वीर हो अति धीर हो। उज्जवल रहे सर से सदा ,निज धर्म रथ खंभीर हो।।।।3।।

यह डर सभी जाता रहे ,मन बुद्धि का इस देह का। निर्भय रहे हम कर्म में, पर्दा खुला स्नेह का।।

गाते रहे प्रभु नाम पर, प्रभुतत्व पाने के लिए। हो ब्रह्मा विद्या का उदय ,यह जी तराने के लिए।।।।4।।

अति शुद्ध हो आचार से, तन मन हमारा सर्वदा। अध्यात्म की शक्ति हमें, पल भी नहीं करदे जुदा।।

इस अमर आत्मा का हमें, हर श्वास भर में गम रहे। गर मौत भी आ जाएगी, सुख दुख हम में सम रहे।।।।5।।

गुरुदेव तेरी अमर ज्योति, का हमें निज ज्ञान हो सत ज्ञान ही तू है सदा ,यह विश्व भर में ध्यान हो।।

तुझ में नहीं है पंथ भी, ना जात भी ना देश भी। तू है निरामय एक रस है, व्याप्त भी अरू शेष भी।। ।।6।।

गुणधर्म दुनिया में बढ़े, हर जीव से कर्तव्य हो। गंभीर हो सबके हृदय ,सच ज्ञान का वक्तव्य हो।।

यह दूर हो सब भावना ,हम नीच है अस्प्रश्य है। हर जीव का हो शुद्ध मन, जब कर्म उनके स्प्रृश्य है।।।।7।।

हम भिन्न हो इस देह से, पर तत्व से सब एक है। हो ज्ञान सब में एक ही, जिससे मनुज निःशक हो।।

तुकड़या कहे ऐसा अमर पद, प्राप्त हो संसार में। छोड़े नहीं घर बार पर ,हो मस्त गुरु चरणार में।।