मन्दिर मन की भावना !
(तर्ज : ये हरियाली, और ये रासता....)
मन्दिर मन की भावना !
इस मन्दिर में, सद्गुरुजी की -
करता हूँ मैं स्थापना ! ।।टेक।।
वृक्ष लगे है रंग सुहावन ।
सुगंध आता फुलता है मन।।
निर्मल है मन, मोहक ये बन।
पूजा करूँ, ध्यान धरूँ, करूँ कल्पना।।1।।
हृदयासन अति कोमलतर है।
प्रिती की ज्योति अति सुन्दर है -
गंगा-जमुना निर्मल निर है ।
स्नान करूं, ध्यान धरू,करू कल्पना।।2।।
भक्तीका चन्दन,वृत्तीकी माला।
षट्गुण सदमन अंग-दुशाला।।
सोsहं की लाली,भार गुलाला।
काम त्यजूँ, क्रोध त्यजूँ, छोड वल्गना।।3।।
शान्ति की बीना,सोsहं की आरती।
इस तनकी भारी बानी पुकारती । ।
तुकड्याकी पूजा जीवन उद्धारती ।
नाम स्मरुँ काम करुँ, धरूँ धारणा ।।4।।