मेरी बातपे तुमरा ध्यान नहीं ।
(तर्ज : जीवन में पिया तेरा साथ रहे... )
मेरी बातपे तुमरा ध्यान नहीं ।
मैं क्या कहता हूँ , सुनियेना ! ।।टेक।।
मेरी न मुझे पर्वाह पड़ी । यह परदुख देखा नहीं जावे।
क्यों एक दरिद्री, एक सुखी ? सबमें समता को करियेना ।।1।।
कोई कष्ट करे, पर वस्त्र नहीं, कोई गप्पा पर भी माल चखे।
ये न्याय तुम्हारा है कैसा? यह हमसे तो कुछ कहियेना ।।2।।
जन-लोक तो तुमको ही कहते, भगवान ही तो सब खेल करे।
गर हाथमें उसके है सारा, तब दोष हमारा कहियेना ।।3।।
तुमको तो यही कहना है उसे, तुमरी करनी के फल हैं ये।
जब साच करो तब सुख पावो, और पाप करो तो भरियेना ।।4।।
यह बात सही गर है तुम्हरी, तब सबको ज्ञान न क्यों इसका ।
तुकड्या कहे, संत समागमसे, यह दोष हमारे बहियेना ! ।।5।।