मेरे गुरुदेवसे दो मिला ।

(तर्त : चाँद जाने कहाँ खोगया... )
मेरे      गुरुदेवसे       दो       मिला ।
मैने अपने जीवनको, मिटाना न था ।।टेक।।
हुक्म था कि मैं मानव-जनम पाऊँगा।
प्यारे भगवनकी सूरत नजर लाऊँगा।
आजही मैं तो कैंसा भुला !
काम -क्रोधो के रस को चटाना न था ! ।।1।।
जैसी संगत मिली थी मुझे ।
वैसी रंगत चली थी मुझे ।
पर ये देखा तो सब खोखला।
अच्छा जीवन ये दुख में बँटाना न था ! ।।2।।
अबके आती है  सारी शरम ही ख़ुली।
मैंने सत्संग की तो न देखी गली।
राह सन्तों ! - ये देना भला?
कहता तुकड्या,ये मौका हटाना न था ! ।।3।।