मनकी अटपट है बानी ।

            (तर्ज : गेला हरी कुण्या गांवा ? .... )
मनकी अटपट है बानी । सदाही खटपट शैतानी ।
                 किसीने झटपट नहीं जानी  ! 
कोई गुरु - ग्यानी, ग्यानी   ने   जानी  ! ! ।।टेक।।
किसकी पुजा बडी भारी, फुलोंकी ढेर चढे सारी।
लम्बी माला है गहरी, फेरते   दिनिभर ही  जारी।।
कोई बन -बनमें रहते है, भेखके भारी अभिमानी।
                कोई गुरु -ग्यानी , ग्यानी ने जानी! 0 ।।1।।
किसीका लंबा है चंदन,किसी ने किया भस्म लेपन।
किसीका भार बढ़े मन -मन, किसीने साधा है आसन।।
हजारो साधन करते हैं, होती है तो भी हैरानी ।
                 कोई गुरु-ग्यानी, ग्यानी ने जानी ! 0 ।।2।।
जिसने सतसंगत साधा, सम्हाली इंद्रिय-मर्यादा।
भक्ति प्रेम जिन्हे ज्यादा, किया नहिं किसीकी भी निंदा।।
कहे तुकड्या वही जीते, समेटी जिसने शैतानी।
                 कोई गुरु-ग्यानी, ग्यानी ने जानी ! 0 ।।3।।