बनालो सहकारी खेती, पकावों मिलके भलिभाँति ।

                   ( तर्ज ,.गेला हरी कुण्या ....)
बनालो सहकारी खेती, पकावों मिलके भलीभाँति ।
करो फिर धनकी उत्पत्ति ।।
बढ़ेगी छाती, देश की उन्नति ! ।।टेक ।।
देश ये किसान का कहते, मगर इसमें तो सभी रहते।
सभी ही काम - धाम करते,बखतपर वो खाना चाहते। 
इसमें शक हि नहीं होता, चाहिजये अनाज को भरती। 
बढ़ेगी छाती, देश की उन्नति ! ।।1।।
बढई कारागिर भी है, बुनकर - लुहार - दर्जी हैं।
घडाने बेलदार चाहिये, मोची-कुम्भार भी तो हैं।।
वैद्य और वकील गुरुजी भी, सभी को रहती है नाती।
बढ़ेगी छाती, देश की उन्नति ! ।।2।।
अकेले खेति करोगे तुम, बल नहीं तो रो लोगे तुम।
चारहुँ भाई मिलोगे तुम, पड़ेगा नहीं जरा भी कम।।
इसे शासन भी मदद देता,गरज जब किसान को होती।
बढ़ेगी छाती, देश की उन्नति !  ।।3।।
खेती सब मिलकर करना, मुनाफा सब मिलकर लेना।
सच्चा हिसाब भी रखना, जमीं की देखभाल सिखना।।
तुकड्यादास कहे मित्रो ! चलेगी अब तो यही नीति।
बढ़ेगी छाती, देश की उन्नति ! ।।4।।