बस करो नाथ ! ये आपदा
(तर्ज : मजसवे बोल रे माधवा .. )
बस करो नाथ ! ये आपदा ।
दरसन दो यह खोलके परदा ।।टेक।।
अति विरहों से मुरझायेंगे ।
तब तुमको कैसे पायेंगे ? ?
तुमरी नीति ऐसी नहीं सदा ।।1।।
जब प्रल्हादने नाम पुकारे।
दौरे हो तुम खंबको फारे।।
गजके कारण धर ली थी गदा ! ।।2।।
द्रूपद-सुता की लाज सँबारी ।
तुमही वस्त्र पुराये मुरारी।।
हम भुले यह वाक्य नहीं कदा ।।3।।
सब विषयनसे मन अब रूठा ।
अब चाहते तुम्हरा सित जूठा।।
तुकड्यादास को पावे सुखदा ।।4।।