यहीं करो नाथ ये दासको
(तर्ज : मज सवे बोल रे माधवा...)
यहीं करो नाथ ये दासको ।
तन न रहे, पर मन लो पासको ।।टेक।।
मन जब तुम्हरे चरण में आवे ।
तब कहीं तन भी दौर लगावे ।।
मन-विकल्प ही करत नाशको ।।1।।
जब सत्संग में मन जावे ।
साधन तब भक्ती के पावे।।
कुसंग से मन होत न बसको ।।2।।
जिनके मन प्रभु-सुमरण भाया।
उनको नहिं व्यापे यह माया।।
वहि चाखत हैं अमृत रसको ।।3।।
परिवर्तन हदयों का होना।
सत्गुरु बिन अधिकार कहीं ना।।
तुकड्या कहे, पूरण हो आसको ।।4।।