मन बसा एकही आखरी

(तर्ज : मज सबे बोल रे माथवा...)

मन   बसा  एकही  आखरी ।
बिन सत् गुरु कोउ न तारी ।।टेक।।
सब चाहते स्वारथ ही अपना ।
जिधर-उधर है अपना रोना।।
इसमें  भूले   हैं   नर - नारी ! ।।1।।
पर-उपकार की बात कहाँ है
बदला माँगे जहाँ-वहाँ है ।।
दे थोडा, पर माँगत भारी !  ।।2।।
प्राण पिताका उड़ने लागा।
धनके खातर बेटा भागा।।
होय पिताकी मौत  बिचारी ! ।।3।।
ऐसी दुनियाँ में क्या रहना ?
सत्‌गुरु के चरणों में मरना।।
तुकड्या कहे,अर्जी है हमारी !।।4।।