मोहे लगी प्यारकी बाँसुरी !

(तर्ज : सुरगणा जायरे तू रणा....)
मोहे  लगी   प्यारकी   बाँसुरी ! ।
बाज गयी तब सुध-बुध हारी ! ।।टेक।।
उन गोपिनको जैसा है साथी ।
हमपर भी वैसी ही बीती।।
ध्यास लगी, कब पाये मुरारी ! ।।1।।
सुन पुरान भगतन्‌की बानी ।
गिरीधर सब ही अंतरयामी ||
दौरत हैं   ले   गरुड   सँवारी ! ।।2।।
हम वहीं आस लगा बैठे   है ।
दरसन को अँखियाँ ऐठे हैं ।।
चैन नहीं बिन   पाये    बिहारी ! ।।3।।
उस बन्सीमें प्यार   भरा  है ।
सुनते ही दिल-मन सुधरा है।।
तुकड्यादास ने जब सुन डारी !।।4।।