धीरे-धीरे खसक रहा है , इस भारतका नूर

(तर्ज : बार-बार तोहे क्या समझाये.. ? )
धीरे-धीरे खसक रहा है, इस भारतका नूर ।
पशुके समान होगा, मानवका जीव   सहूर ।।टेक।।
कितनी बार कहा, समझाया, मानवताके साथ।
अरे यार ! भूलोगे तो मिलेगा नहीं प्रभू हाथ ।।
घरघरमें गाते हो जैसा लैला-मजनू गान ।
देशका ठिकाना क्या है,विषयों में होगा तुफान।।
जो ऊठे वो करें तमाशा, छोड धर्मका सूर।
पराधीन देश हो तो  कैसे  रहेगा  ये  धूर  ? ।।1।।
साधू चूर रहे गांजामें, पंडित है खाने में।
नौजवान हैं भूले-भटके, नाच रंग गाने में।।
मन्द्र-मन्दर कूडा-कचरा, नहिं दिपक ना प्रेम ।
भरी गंदगी तनमें, मनमें नहीं निति के नेम।।
कहे दास तुकड्या कैसा, खुशी में रहेगा हुजूर।
धीरे-धीरे खसक रहा है, इस भारतका नूर ! ।।2।।