बादल छाये मोरे नैननमाँही
(राग : बागेश्री, ताल : तिनताल)
बादल छाये मोरे नैननमाँही ।
तिमिर भरे, कुछ सूझत नाही ! ।।टेक ।।
ज्ञानकि ज्योती मंद जलत है ।
विषय -विकारी न होत जुदाई ! ।।1।।
खावत-पीवत चैन न पावे ।
इन्द्रिय-गण सब रहत सवाई ! ।।2।।
बाहर देखनको हूँ पंडित ।
पर अन्दर सब पाप समाई ! ।।3।।
कौन करे किरपा अब मुझपे ?
बिन सद्गुरु के पार न पाई ! ।।4।।
तुकड्यादास कहे, सत्गुरु भी ।
बिन भक्ती नहिं देत दुहाई ! ।।5।।