नहीं बोलता फिराभी बुलवा रहा हूँ

      (तर्ज: अजब है ये दुनियाँ... )
नहीं बोलता फिरभी बुलवा  रहा  हैं ।
नहीं खेलता फिरभी खिलवा रहा हूँ ।।टेक।। 
मेरी आँख हूँ मैं, नहीं   आँख   दूजी ।
मेरे कान, हूँ मैं, नहीं कान दूजी ।।
मेरा ही शरीर मैं, झुलवा रहा हूँ ।। नहीं खेलता0।।१।।
इसही तत्हे विश्वको चेतता हूँ । 
चेतन हैं    में, सबमे  सर्वदा  हूँ ।।  
वो मैं हूँ, वह तू है- यह बतला रहा हूँ ।। नही खेलता 0।।२।।
जुदा मुझसे क्या है, मे साक्षि हूँ सबका ।
हुई मौत फिर भी, जरा मैं  न   खिसका ।।
अनादि ही मै हूँ, और सब गा रहा हूँ।। नहीं खेलता 0।।३।।
मैं ही तो जिव हूँ, जिव ही तो शिव हूँ ।
वही ब्रह्म हूँ मैं, साक्षी - चेतन   हूँ ।।
मेरा रुप है ये, मैं हिलवा रहा हूँ ।। नहीं खेलता 0।।४।।
मेरा मुझमें आनद, मुझसेहि कर्ता ।
चराचर ये बनके औ मुझमें बिचरता ।।
कहें तुकड्या अनुभव ये सुनवा रहा हूँ ।। नहीं खेलता 0।।५।।