बाबा ! धरतीको दे दान
(तर्ज : सबसे मिठा बोल बाबा...)
बाबा ! धरतीको दे दान,
कहता यह भूखा भगवान ।।टेक।।
किसका हक छीनकर चलना ।
हक छीन जावेगा अपना ।।
छोड छोड दे मोह, द्रोह सब ,
बन अब तो इन्सान ।।१।।
तूभी कर कुछ काम यहाँपे ।
तब पावे आराम यहाँपे ।।
नहीं तो दुख होगा जीवनमें ,
मान! यह कहना मान ! ! ।।२।।
धन औ धरती बँटके रहेगी ।
भूखी जनता अब न सहेगी ।।
-कहता फिरता संत विनोबा ,
सुन तो देकर कान ।।३।।
नहीं तो यहाँ तुफान मचेगा ।
फिर तो तू कया कौन बचेगा ?
तुकड्यादास कहे भूखोंकी ,
होती आह महान् ।।४।।