मलीनता की काँत पटकने
(तर्ज : छंद)
मलीनता की काँत पटकने,
संक्रान्ती - क्रान्ती आयी ।
जीवनकी उज्वलता बढ़ने,
दानधर्म करले भाई ! ।।टेक।।
घरघर में जा मानव बनके मानवता की ज्योत जगा ।
बुरी आदतें सभी छोड दे, नया स्नेह नवसंग लगा ।। १।।
ज्यादा हो तो दे गरिबोंको मीठा कर दिल गरिबोंका ।
सबके बराबर हो जा तू भी जर-डर का खोकर धोका ।।२।।
कमती हो तो माँग हकसे हिस्सेदार समझकर के ।
गलत राहसे मत चल, करले- प्रेम भाईचारा भरके ।। ३।।
बच्चे, बुढे, जवान सारे नया प्रेम - संकल्प करो ।
मीठा दो खानेको; सब मिल- एक नेम सब क्षेम भरो ।। ४।।
जातपाँत सब भूलके अपनी मानवजात का गर्व करो ।
तुकड्यादास कहे यह जिंदगी विश्वरूपमें जाय भरो ।।५।।