प्रेमियों को प्रेम देना ही हमारा फर्ज है
(तर्ज: आठ्ठशा तुज भोवती...)
प्रेमियों को प्रेम देना ही हमारा फर्ज है ।
बापुने समझा था यह,करके निभायी गर्ज है ।।टेक।।
शस्र के बिनहीं कहीं होती लडाई कब सुना ।
कर दिखाया गांधीने, उसकी अहिंसा तर्ज है ।।१।।
मारनेको सब कहे, मरने सिखावे कौन है ।
शक्ति उसमें ही विजय की,थी अजब वह अर्ज है ।।२।।
है बना उपसे या किससे, यह हमें मालुम नहीं ।
पर बना आजाद भारत, मिट गया सब कर्ज है ।।३।।
अब रहा. आबाद होना, आज का नेता करें ।
दास तुकड्या यों कहे, सब पेशियाँही दर्ज है ।।४।।