प्रीय गांधीजी ! तेरा सवराज क्या ऐसाहि था ?
(तर्ज: है नहीं जिसमें कदर... )
प्रीय गांधीजी ! तेरा सवराज क्या ऐसाहि था ?
जिसमें चोरी और डकैती का कहर वैसाहि था ।।टेक।।
झूठ लेना और देना, दिनदहाड़े खून हो ।
लाच लुचपत भी बढे, सबका प्रभू पैसाहि था ? ।।१।।
भाई-भाई में न बनता, गाँवमें झगडे मचे ।
मान-सत्ता के लिए, मुरगे लडे - जैसाहि था ? ।।२।।
बेच दें नकली दवा, चाँवल में कंकर डाल दम
नाज भी न मिले,गरीबों का गुजर कैसाहि था ? ।।३।।
हो अधार्मिक देश सारा, नाश हो चारित्रय का ।
आलसी जनता रहे, क्या सोचना भैंसा हि था ? ।।४।।
गर नहीं था लक्ष्य यह, तब आज केसे आगया ?
तू गया सबही गया,तुकड्या कहे नहिसा हिं था ?।।५।।