बापुने कुष्ठरोगी को अपना लिया

(तर्ज : श्यामसुन्दर की मीठी...)
बापुने कुष्टोगी  को   अपना   लिया ।
खुद मला हाथ से करके सेवा किया ।।टेक।।
दर्द उनके हृदय में था करुणा भरा ।
भूले - भटके   को   देते    सहारा   पुरा । 
उनकी आत्मा ने भारतहि घर था किया ।।१।।
कुष्टियों के भी है देह इन्सान के ।
टूटे-फूटे ये मन्दिर हैं भगवान के ।
भावना थी यही, था तडपता जिया ।।२।।
सच्ची ईश्वर की भक्ती हि सेवा कहा ।
जो करेगा सो पावेगा मेवा कहा।
संग वहीं आयगा, दान जो दे  दिया ।।३।।
गांधी का पूर्ण सेवा में इतबार था।
और ईश्वर की श्रद्धा में निर्धार था।
उसलिये अन्त में  राम  ही  आगया ।।४।।
गांधीने हर जगह मन्त्र बोला यही ।
कुष्टके निर्मुलनकी ही इच्छा रही ।
दास तुकड्या कहे,नाम रोशन किया ।।५।।