वह खादीकी चद्दर थी

        (तर्ज: विश्वास पे क्यों बैठा है...)
वह खादीकी चद्दर थी, शान्ति से भरी अन्दर थी ।
थी गरिबों की रोटी जो,
भावना समुन्द्रभर   थी ।।टेक।।
नौखाली में झगडा था, जब व्दंद बना था तगड़ा ।
सबने रोका था बापू को, पर नहि  माना  पगड़ा ।।
घर-घर में उसे जाना था !
सबको ही समझाना था ।।
ऐसीहि गांधी की नीति, सबपर ही असर करती थी ।।१।।
उस खादी की चद्दरपर ही, देश -विदेश गया था । 
भारत की गैया और बेकारों को बचा लिया था ।।
सब छुआछुत   की   नीति ।
सत्‌-असत्‌ कर्म की भाँति ।।
तुनेहि दिखायी ज्योति, छुपके जो मन्द्र में थी।।२।।
गांधी -गांधी बोल बोलकर, सारा देश जगा था ।
बलिदानों से आजादी का,यज्ञकुण्ड सुलगा था ।।
बन्दुक, जेल    या   फॉसी ।
यह हँसी हि समझी जाती ।।
तुकड्या कहे जन-सेना में, क्रान्ति की लहर सुन्दर थी ।।३।।