भारतभूमि के रज - कण में

         (तर्ज : बेष्णव जन तो तेणे कहिये... )
भारतभूमि के रज-कण में,सत्य-अहिंसा फेर जगायी ।
मानवता को मिली प्रतिष्ठा, हरिजन के सँग प्रीत लगायी ।।टेक।।
निर्भयंता का मन्त्र दिया और, सत्याग्रह की दीक्षा पायी ।
रामनाम की अन्तर धूनी, अष्ट प्रहर गूँजे मनमाही ।।१।।
जीवन के सब पहलू फूले, खोज-खोज खेती बहरायी ।
चरखा घर-घर गूँजे, सबको उद्योगों की राह बतायी ।।२।।
बालक, बूढे, युवक साथ थे, महिला की उन्नती करायी ।
ऐसा गांधी भारत में फिर, बार-बार आवे हो भाई ! ।।३।।
तुकड्यादास कहे सन्तों की, प्रिय भूमी है भारतमाई ।
विश्वधर्म,विश्वात्मक प्रियता,जाग उठे हम सबके माँही ।।४।।