प्रभू हाजीर है हरदम
(तर्ज: अगर है शौक मिलने का...)
प्रभू हाजीर है हरदम, कहाँ ढूँढनेको जाता है ?
जो रखता साच अपना दिल, वही उसको सुहाता है ।।टेक।।
न मिलता देवलों अंदर, न पाता मसजिदों भीतर ।
खड़ा रहता वहाँ जाकर, दीन जहाँ लो लगाता है ।।१।।
ऋषी और तापसी देखे, तपस्या साधकर जिसको ।
गरीबों के घरों भीतर, सदाही दुख उठाता है ।।२।।
रमे घट-घट में वह सबके, करो पूजा स्वकर्मों से ।
जो हिंसक दीन जीवों का, उसे कबहूँ न भाता है ।।३।।
रखो गर लाज दीनों की, करो सेवा पतीतों की ।
तो आपहिआप आता है, नजर में चश्म छाता है ।।४।।
यह तुकड्यादास की आशा, मिटे ऐसी मिटानेपर ।
समादो देह सेवा में, तो बेडा पार होता है ।।५।।