ध्यान लगा, बैराग जगा, मेरा छुटा घर-संसार रे !

(तर्ज: तन डोले मेरा मन डोले...)

ध्यान लगा, बैराग जगा, मेरा छुटा घर-संसार रे ! ।
शंकर का डमरु कान सुना। भोले का डमरू 0।।टेक।।
डिमि-डिमि डमरु बाज पुकारे, खूले पंचम व्दारे ।
त्रिकुट शिखर का आसन डोला, सोsहं के झनकारे।
मोह भगा, जब रंग लगा,तब चढ गयी दिलमें तार रे?।
शंकर का डमरु0 ।।१।।
सिरपर जटा, जटा पर गंगा, नाग गले लटकारे!।
भस्म रमाया त्रिशुल हाथमें, व्याघ्रासन कटि मारे।
जी न डगा, देखने लगा, तुकड्याकी सुनी पुकार रे।
शंकर का डमरू0।।२॥।