पकडके रखो एक गुरुनाम को

(तर्ज: किसी मस्त के आने की आरजू है...)
पकडके रखो एक गुरुनाम को ।
कहाँ भूलकर जा रहे धाम  को ? ।।टेक।।
रखा क्या वहाँ ? आज धुमधाम है ।
बिगर चोरिके और  ना   काम   है ।
जहाँ भाव तेरा वही राम है ।
भजन कर यहींपर तू निष्काम है ।
समझ सद्गुरु रुप है रामको ।। कहाँ 0।।१।।
जहाँ पर  गुरुसंग-दरबार है ।
वही जान तू मोक्षकी धार है ।
मिटा ज्ञानसे, भूल - अन्धार  है ।
चला जा लगाले नजर - तार  है ।
न जेवर लगे  ना  मँगे  दामको ।। कहाँ 0।।२।।
रहा पासमें तो  खिला  दीनको ।
बढा अंध दुबले किया जिनको ।
दया धर गरीबोंकी तज रीणको ।
पकड़ लीनता साथ  दे  हीनको ।
पक प्रेम,सबमें समझ श्यामको।।कहाँ 0।।३।।
जिसिके नहीं भावकों नैन है ।
उसीको नहीं तीर्थ में चैन है ।
बनेगा सभी द्रव्य आधीन है ।
उड़ा जायगा रंग  संगीन  है ।
रहेगा सभी दिल यही  ग्राम  को ।।कहाँ 0।।४।।
बने सो करो प्रीती - नीती  भलो ।
जलावो विषय-वासना जो जली ।
बह तुकड्या कहे,उम्र इसमें ढली ।
चला जायगा राह  सुखकी  खुली ।
अगर हो खुशी तो भटक भ्रामको।।कहाँ 0।।५।।