मेरे प्रभु सन्तन को सुखदायी

         (तर्ज: मेरे प्रभु झूला झूले घरमाँही ...)

          मेरे प्रभु सन्तन को सुखदायी ।।टेक।।
और सभी स्थान में वह समाया,पर भक्त में है बिसेसा।
देख पड़े रुप उसका वहीपर,जा घट सत्‌का निवासा ।।१।। 
प्रभु एक नटनाटक है जगतका, उसने यह खेल खिलाई । 
जो कुछ होवें उसे जो न छूता, पाता वही शान्ति भाई ।।२।। 
ब्रह्म - स्वरुप साकार करम-रत्‌, वही अवतार कहाई । 
तुकड्यादास कहे जो जगतमें,शान्तिकी धारा बहाई ।। ३।।