प्रेम दिवाना , प्रेमने जाना
(तर्ज: प्रेमकी प्यासी बनी बनवासी . . )
प्रेम ! प्रेम ! !
प्रेम दिवाना, प्रेमने जाना, प्रेममें प्रेम समाई ।
प्रेमका रुप स्वरूप प्रभुका, प्रेमी प्रगट कराई ।।टेक।।
मैं देख रहा, प्रभु-प्रेम बहा,
में हूँ तुम्हारा, तुम हो मेरे ।
इस नशाने मुझको घेरा,
हो हि गया उजियारा।। प्रेम 0।।१।।
मैं देखूँ जिधर, है तूहि उधर ।
मैं न मुझमें, तू न तुझमें ?
कहत तुकड्या सुनले आशिक !
होजा प्रेमका प्यारा ।। प्रेम 0 ।।२।।