प्रगट भयी रात अँधेरी बडी
(तर्ज: घरधनी गेला दर्यापार...)
प्रगट भयी रात अँधेरी बड़ी ।।टेक।।
चमकत बिजली, बरसत पानी । गर्जत बादल भी मनमानी ।
नाव किनारे अडी ।। प्रगट0।।१।।
दूर गये मन-मोहन श्यामा | नजर न आते है निजधामा
डरसे अँखियाँ चढी।।प्रगट 0।।२।।
भूले राह सभी कुंजनकी ।चाल चले अपने मन-मनकी
भूल समझ में पड़ी ।। प्रगट0।।३।।।
तुकड्यादास कहे क्या करना ? प्रबल मोह-माया किम् तरना ?
गुरुबिन बातें नडी ।। प्रगट0।।४।।।