मोहन ! एकबार फिर आओ
(तर्ज: काहेको परघट दौरत... )
मोहन ! एकबार फिर आओ ।
अपनी बन्सी बजाओ ।।टेक।।
तडप रहे है प्राण हमारे, जग का दुःख मिटाओ ।।१।।
भड़क रही ज्वाला दुनिया में, आकर अग्नि बुझाओ ।।२।।
रोते है गरिबन के बालक, उनकी भूख मिटाओ ।।३।।
मीठी तान सुनाओ मोहन ! नहिं तो शंख बजाओ ।।४।। नींदभरा यह विश्व जगाने, अपना शंख बजाओ ।।५।।
ब्रीद तुम्हार सुना संतनसे, तुमहि तो लाज बचाओ।।६।।
तुकड्यादास उदास जगतसे, आकर शांति दिलाओ ।।७।।