प्रेम भजन रघुबरको
(राग : आसावरी, ताल : दादरा)
प्रेम भजन रघुबरको, कान सुनत जाग गयो ।
रंग लागों हृदयनसो, तन-मनको भान गयो ।।टिक।।
बीना की तार चढी, स्वाँसा की बोल बढी ।
नस-नस सब डोल गयी,जान भक्ति मान गयो ।।१।।
नैननसो नीर बहा, कण्ठ रुप स्थीर हुआ ।
सात्विक गंभीर वृत्ति, धुन समाधी लाग गयो ।।२।।
नाच गये जन-गण ये, वृक्षलता मधुबन ये ।
तुकड्याको अपनाकर, शरयू तट दर्श दियो ।।३।।