बूझ गया मेरा ग्यान - दिया

             (तर्ज: घर आया मेरा परदेसी... )
बूझ गया मेरा ग्यान -दिया, कैसी दिवाली मनाऊँ मैं ? ।
सद्गुणका उल्हास नहीं, किसबिध साज सजाऊँ मैं ? ।।टेक।।
इस तनमें मन गंदा है, दिल विषयन में  अन्धा  हैं ।
किसके कान सुनाऊँ मैं ? कैसी दिवाली मनाऊँ मैं ? ।।१।।
कौन करेगा साफ मुझे ? सब दोषनसे माफ मुझे ।
किसके चरण में जाऊँ में ? कैसी दिवाली मनाऊँ में ?।।२।।
बिन सतगुरुके ग्यान नहीं, सब देते आवाज यही ।
किसबिध दर्शन पाऊँ मैं ? कैसी दिवाली मनाऊँ मैं ? ।।३।।
जिधर उधर अंधियारा है, नजर न आता प्यारा है ।
किसके संग गुण गाऊँ मैं ? कैसी दिवाली मनाऊँ मैं ? ।।४।।
बिन भक्ती नहिं ग्यान मिले, बिना ग्यान नहिं दिया जले ।
बिन दिया न सुखाऊँ मैं ? कैसी दिवाली मनाऊँ मैं ? ।।५।। 
तुकड्या कहे मेरे मन्दरमें,दीप जलाओं कोई अन्दरमें ।
जित उत प्रभु गुण गाऊँ मैं, कैसी दिवाली मनाऊँ मैं ? ।।६।।