पलभर भी नहीं प्रभू को सुमरे
(तर्ज: मेरे दिलमें गुरुने जादू किया... )
पलभर भी नहीं प्रभू को सुमरे, तेरा कौन नतीजा होवेगा ।
नहिं जागत है इस जीवनमें, कहाँतक प्यारे अब सोवेगा ।।टेक।।
फिर तो सोना ही सोना है, जब जनवरकी वह जन्म मिले ।
नहीं ज्ञान,न ध्यान सधे कुछ भी ,फिर सार्थक क्या कर लेवेगा ।।१।।
अपने हितको नहिं जानत है, नहि संत वचन पहचानत है ।
विषयोंके नचे नचता है सदा, अनमोल बखत यह खोवेगा ।।२।।
ले हाथ धुला बहते जलमें,जा सन्तन के चरणों में कहीं
चढवाले नशा प्रभु सुमरनकी, तो सुख जीवनभर पावेगा ।।३।।
ले पूछ समझदारों से कहीं, उध्दार मेरा होगा कैसे ? ।
तुकड्या कहे, कर सेवा सबकी, तबही तो अमर हो जावेगा ।।४।।