मातता - पिताकी आज्ञासे राम त्यजे राज

              (तर्ज : दो हंसो का जोडा.... )
      मात-पिताकी आज्ञासे राम त्यजे राज ।
तुम बात भी न सुनते तो भक्त कैंसे आज ?।।टेक।।
निषाद्‌ और केवट-से अछुतों का प्यार किया ।
बनवासि आदिवासी साथ ही  उध्दार  दिया ।।
झूठ बेर खाये और भिल्लिनी को पार  किया ।
परस्री न देखी दीठ, शत्रू को न  पीठ  दिया ।।
तुम    ठीक   इनसे   गलत     करो     काज !
तुम बात भी न सुनते तो भक्त कैसे आज ? ।।१।।
बिना सत्य बोलेसे दिन नहीं जाता है ।
झूठ का सहवास एक क्षण भि नही भाँता है ।।
लोभ-दंभ-मोहका हमसे   नहीं  नाता  है ।
यही चाल चलता वो भक्त मोहे भाँता  है ।।
तुकड्या कहे, ऐसा   न  रखते  लिबाज !
तुम बात भी न सुनते तो भक्त कैसे आज ?।।२।।