मोहे अति आनन्द, सन्त छन्द लाग गयो रे !
(तर्ज : मोहे पनघटपे नन्दलाल॑ ...)
मोहे अति आनन्द, सन्त छन्द लाग गयो रे !
मेरे जनम-जनम दुख सभी भाग गयो रे ।।टेक।।
फिकर गयी विषयनकी ,भ्रान्ति गयी सब मनकी ।
लाज नहीं तन - जन की ।।
सोयी थी मन्द वृत्ती,जाग गयो रे ! ।। मोहे 0 ।।१।।
चलत प्रेम, बसत प्रेम, सोवत-जागत ही प्रेम ।
हृदय मिलत झुलत प्रेम ।।
प्रेम नहीं जामें, मन त्याग गयो रे ! ।। मोहे0 ।।२।।
जनम्-मरन है समान, जिसको है ब्रहाज्ञान ।
फिर छूये क्यों तुफान ??
तुकड्याकी नजर,भेद भाग गयो रे ! ।।मोह 0।।३।।