मोरी जात ना, बिद्या लो

(तर्ज : मोहे पमघटपे नंदलाल छेड गयो है...)
मोरी जात ना, बिद्या लो, नाथ आओ पधारो ।
मैं  केवट  हूँ, नदियोंके   रहत   सहारों !  ।।टेक।।
भाग बडे आज मोरे, रघुबरने नांव धिरे ।
सीता - सँग चाय करे ।।
लछुमन भी बंधू साथ, दर्श  निहारो।। मोरी0।।१।।
चरण धोये साफ करूँ, तब कहीं नावोंमे धरूँ-
पूजन भलीभाँति करूँ ।।
गंगा के पार  करत   साँज   संवारो।। मोरी 0।।२।।
मैं गंगा पार करूँ, धन में ना चित्त धरूँ ।
बदली में एक स्मरूँ ।।
तुम्हरे घाट आऊ नाथ,तो मोहे भी तारो।।मोरी 0।।३।।
गंगा घाट मेरो है, भवसागर तेरो है ।
बात ये उधरो है ।।
तुकड्यादास कहत,राम ! बरद दे डारो।।मोरी 0।।४।।