मन की अटपट बानीका

        (तर्ज : हरिका नाम सुमर नर प्यारे...)
मन की अटपट बानीका, कोई खोज नहीं कर पाता । 
घडी-घडी में नयी दुनिया का,सुख-दुख बना सताता ।।टेक।।
कलकी निबटी बात, आज फिर और तमासा लाया ।
बिना काम का, बिना सोच का, फिर संसार उठाया ।।
सुख-दुःख दोनों भरके दिलमें, रोना -हँसना  भाया ।
मनका दिलपर,दिल का तनपर,बडा असर करवाया।।
सच्ची तो नहीं बात, मौत पर, मुर्दा जले बनाता ।
मौत भली पर सोच बुरा है, इतना नाच नचाता ।।१।।
कितनी शान्ति रह पायेगी, जब अंगार  गलाये ।
बाहर हो तो चटका खाली पर ये दिया जलाये ।।
चाहे खा लो घी-शक्कर पर मिरची ही लग जाये ।
सदा जला दी मन की बाँती, जरा न बूझी पाये ।।
बिना जबरदस ग्यानकी ज्योति किसे न होला होता ।
गुरुकृपा का जिसके सिरपर, हाथ हो वही निभाता ।।२।।
अभी तो निपटा एक फिकरसे, फेर कहाँसे आयी ?
गली-गली में भरी पडी है, इसकी   दौलत   भाई ।।
मेरी हो या और किसी की, जिधर-उधर से आयी ।
धड़काती है दिलपर चोटे, मौत भली   रे  भाई ! ।।
हवा चली फिर भी मारती है लपट कान को बाता ।
अरे ! कहाँतक गमसम करना, टुटे न इसका नाता ।।३।।
साधू के घर चलो फेर भी, वही चले   चतुराई ।
मंदर-तीरथ चलो, वहाँ भी है इसकी शहनाई ।।
राज-पाट के संग रहो फिर भी न कटे-कटवाई ।
इधर-उधर क्या चारों ओर में इसकी चली हवाई ।।
तुकड्यादास कहे, इस युगमें तो यह गजब कराता ।
वारे मन ! तू भले-भले  को, बन्दर   बना   घुमाता ।।४।।