भरि न गयी नैन मोरी
(राग-खमाज, ताल-दादरा)
भरि न गयी नैन मोरी, श्याम-दर्श पायके ।
ऊठ गयी कुंजन से, आस यौ लगायके ।।टेक।।
ढूँढन को जाऊँ कहाँ ? कौन दिखायेगा राह ?
सब तो है मतलब के, मैं हि हूँ अधायके ।।१।।
जब से मिठी तान सुनी,बाँसुरी की मधुर ध्वनी ।
तबसे जान दौर रही, चैन नहिं खायके ।।२।।
नैननसे नीर चले, धीर ना हियाको भले ।
बन - बनकि गौवनको, पूँछता हूँ जायके ।।३।।
तुकड्याकि आस रही, एक बार पाऊँ कहीं !
मिलतेहि श्याम-सखा, जाऊँ फिर समायके ।।४।।