पूछ लो, हम अपने मनको
(तर्ज: मुकुन्दा रुसु नको इतुका...)
पूछ लो, हम अपने मनको ।
उध्दरे कौन दुजा, तुमको ? ।।टेक।।
भव -सागर की ,मोटि हैं गागर ।
तरता है, उसमें हि उजागर ! !
के नर-नारी डूबत देखी- न तोडे इस भव-बन्धन को ! ।।१।।
अहंकार में, फँसा है प्राणी ।
काम-क्रोध की,नशा दिवानी ।।
मैं-मैं करते सब खोता है- जराभि होश नहीं उनको ! ।। २।।
पाप - कर्म करने, मरता है ।
पापी बनकर, दुःख भरता है ।।
आखरी फिर रोते फिरता है-बतलाता है,जिनको -उनको ! ।।३।।
इसीलिये कहता हैं, सुनिये ।
बिन प्रभू-भक्ति,पल ना रहिये ।।
तुकड्यादास गरजकर बोले- खबर दो मेरी जन जन -को ! ।।४।।