मन चंचल क्या इतबार करुँ ?
(तर्ज: मन -मन्दिर में शुगार किया...)
मन चंचल क्या इतबार करूँ ? उनके कहे,कैसे काल टरूँ ! ।।टेक।।
क्षण में वह कहलाता साधू,क्षण में कहे,कुछ भोग धरूँ ! ।।१।।
एक घड़ी राजा बन बोले, पलहि माँगत भीख फिर ! ।।२।।
आलम ही उसकी दौलत है, उसके बल क्या बुध्दि हरूँ ? ।।३।।
तुकड्यादास कहे सत्-सेवा, पाकर के मैं क्यों न तरूँ ? ।।४।।