बरसो बीत गये सुमरनको

                (तर्ज: जाये तो जाये कहाँ...)
बरसों बीत गये सुमरनको, अभीतक के दर्शन नहीं पाये ! ।।टेक।।
कितने दिन है, बिरह-व्यथा ये, समझ न आये-दिल पछताये ।
पल - पल जाती उमर व्यतित ये ! ।।१।।
नैन तड़पते दिल घबड़ाता, जग जंजाल जरा नहिं भाता ।
पागलसम      मन     ढूंढत     हैं ! ।।२।।
लोक कहत है प्रभुके तुम है; पर हम जाने यह सब भ्रम है ।
गुरु     गलियनसे    पूंछ      रहे ! ।।३।।
दर्शनसे यह अर्थ बताते, प्रभु भक्तोंसे दुर नहिं होते !
मन   नहीं   माने    उलझन    ये ! ।।४।।
कब आओगे ऐ गिरिधारी ! दर्शन दो ! कर शांति हमारी ।
तुकड्या   कहे   यह   ख्याल  रहे ।।५।।