प्रतिमा रुपमें आये, दर्श दिखाये ! सद्गुरु आडकुजी मन भाये!
(तर्ज : सद्गुरु नाम तुम्हारा. . )
प्रतिमा रुपमें आये, दर्श दिखाये !
सद्गुरु आडकुजी मन भाये! ।।टेक।।
श्रद्धा-भक्ति भर-भर आयी।
जैसे सागर गागर लायी।
क्यो नहिं उनको दर्शन पायी ?
सगुण भजन जो गाये, सुख अजमाये ।
सद्गुरु आडकुजी मन भाये ! ।।४ ।।
रुप विशाल नग्न अवधूता।
सुवर्ण-बालोंकी वह मृदुता।
विदेह वृत्तीकी निज कंथा।
अंतर-आँख दिखाये, सहज समाये।
सद्गुरु आडकुजी मन भाये ! ।।२॥
आरती गाते हैं नर-नारी।
उनको महिमा पावत पूरी।
तुकड्यादास कहे कर जोरी।
सबको जश-फल पाये, जनम तराये! !
सद्गुरु आडकुजी मन भाये ! ।।३।।