ये गरीबी तो खानेको मौताज है
(तर्ज ..सारी दुनियाँ का तुही...)
ये गरीबी तो खानेको मौताज है ।
और अआमीरी तो चैनोंमें सरताज है ।।टेक ।।
एक तो कष्ट के मारे बेजार है ।
दुसरा व्यसनोंमें भूला नचे यार है ।।
देश क्या चाहता, सुनलों अन्दाज है ।। १।।
देश तो चाहता है कि गरिबी हटे ।
आँख से ना दिखे किसके कपडे फटे।।
खाने -पीने और शिक्षण मिले साज है।।२॥
जो बडे हैं, निगा उनकी नीचे करो ।
वो भी इन्सान होकर रखो साँवरो ।।
सब बराबर हो दुनियाँका गण-राज है।।३॥
धर्म -नामोंमें नहीं कोई कर्तव्य हो ।
सन्त-साधू भी जनता पढाते रहो।।
कहता तुकड्या तभी देश सरताज है।।४।।