मेरे गुरुका है पंथ निराला, बाहर न दिखे रंगवाला

(तर्ज: तुइया स्वरूपी सदा आनंद...) 

मेरे गुरुका है पंथ निराला, बाहर न दिखे रंगवाला । 
पर अन्दर ब्रम्ह उजेला, लखे अजपाजप की माला ।।टेक ॥
कर्म करे पर नहीं आसक्ति,ग्यान कहे पर छोडी न भक्ति।
सहज-समाधी साधे वृत्ति, है पागल-सा अलबेला! ।।१।।
कभी लद-फंद नहीं आवे, नहीं मानप्रतिष्ठा भावे।
कभी झुंड-मुंडके सँगमें, कहीं बनमें फिरे अकेला।।२॥
सबसे प्रेम ,नेम नहीं जाके, आज हैं लड़्‌डू,कल है फाके !
नाच-नाच कभु रैन बिताके, पिवे भजनका प्याला ।।३॥
बिगडेको मार्ग बतावे, दुबले पर निगाह फिरावे।
सब एकरूप समझावे, ओ समझ सके गुरु-चेला ।।४॥
नहिं धूनी, धतूरा सँगमें, ना जटा-लटा भी तनमें।
तुकड्या कहे, हृदय गगनमें, अनहदसे रहता डोला!  ।।५।।