बिगड़ा देश नहीं है मेरा, बिगडे ख़ुद है हम कुमति से ।

(तर्ज : आवो सुन्दर देश बनाये... )

बिगड़ा देश नहीं है मेरा, बिगडे ख़ुद है हम कुमति से ।। टेक ।।
सुन्दर मन्दर है गाँवों में, नहीं जाते हम उनमे।
नाच-तमासों में दिल दौडे, क्यों दें दोष किसीसे ?।। बिगडे0 ।।१।।
विशाल कुश्ती का है अखाडा,नहीं जाते हम उसमे।
शराब, जुव्वा, परनिन्दा पर मरते जाय खुशीसे ।। बिगडे 0 ।।२।।
लिखने-पढने को है शाला,नहीं जाते पढने को।
चबूतरों पर बेठे-बैठे, मारे मक्खी हाँसीसे ! ।। बिगडे0 ।।३।।
सुन्दर भजन -भक्ति का घर है, नहीं रमते हम उसमें।
तुकड्यादास कहे-क्या करना, देशको दोष इसीसे ! ।। बिगड़े0 ।।४।।