बंदे ! क्या बातें करता ? अंतमें खावेगा गोता

भजन २४
(तर्ज : जमका अजब तडाका बे...)

बंदे ! क्या बातें करता ? अंतमें खावेगा गोता 
।।टेक।।

संत-समागम दुर्लभ भाई, रख उनसे नाता।
मोल न होवे अमोल काया, नर क्यों भटकाता 
।।१।।

पुराण पोथी बाचबाचकर, मन चंचल होता।
सद्गुरू साई भजले भाई, ना बन रे तोता।।२।।

सब दुनिया का पालनवाला, सद्गुरु है दाता।
एकचित्त कर भजले उसको, टुटे जनम-ताँता
।।३।।

कहता तुकड्यादास सद्गुरू, श्रध्दा से. पाता।
चित्त शुध्द कर अपना प्यारे, सद्गुरु घर आता ।।४।।