नैनन नीर बरसे !

(तर्ज : ज्योति कलश छलके...)

नैनन   नीर   बरसे !   ।। टेक ।।
बिछड गये जबसे मनमोहन  !
दिल भटके सारा ही बन-बन ।।
जी न   लगे   घरसे !   ।।१।।
जैसी बात बनी गोपिन की ।
ग्वाल-बाल-बछडे गौवन की ।।
क्यों रुठे   हमसे ?      ।।२॥।
 नीन्द नहीं, छाती धडकावे ।
ना जाने प्राणही उड जावे ।।
दिलि कापे   डरसे !     ।।३।।
तुकड्यादासकहे,फिर आओ।
एक बार फिर दर्श दिखाओ ।।
जब-तन-मन हरणे !    ।।४।।