मंदिरको खुला दे ! उन्हें मिलने दे मुरारी । बाजू हो पुजारी ।

(तर्ज: मम बंधु सखा शुन्य जरगीं...)

मंदिरको खुला दे ! उन्हें मिलने दे मुरारी ।
बाजू हो पुजारी ।
बडि बेर भई ! आँखमें  है, दर्दकि  तारी । 
बाजू हो पुजारी ।। टेक ॥
हारिजन है तेरे भाई, धर्म-कर्म के साथी। 
करते है तेरी सेवा, पितु-मातु की भाँती । 
जो कुछ हुआ सो जाने दे, अब साध हुशारी।
बाजू हो पुजारी ।।1।।
जा पूछ ले भगवान तुम्हें प्रीय कौन है ?
गुणधर्म है कि जात कहो, काहे मौन है?
आ करके बता दे न छगा अब कहिं देरी।
बाजू हो पुजारी ।।2॥
भगवान तो बोले नहीं, सब तूहि सुनाता ।
तेरि अक्लका साथी तू तो भगवान बनाता ।
ईश्वरको सब समान है, संतोंने पुकारी ।
बाजू हो पुजारी ।।3।।
झूठा कलंक डाल दिया आजतलक में।
यहि पाप है जो दीख पड़े सारि खलकमें ।
तुकड्या कहे थरकाँपती है, धरतरी सारी ।
बाजू हो पुजारी ।।4।।