नहि गांधी का राज,आजका नहि गांधी का राज

(तर्ज : प्रभु मेरी नाथ किनारे...)

नहि गांधी का राज,आजका नहि गांधी का राज ।।टेक।।
वे नहि चाहते थे घुसखोरी, व्यसनी, दारूबाज   ।।1।।
वे नहि चाहते थे घर-घर में, महँगा बिके  अनाज ।।2।।
वे नहि चाहते थे  यह शिक्षा, करे  देश  मुँहताज ।।3।।
वे नहि चाहते थे यन्त्रों का, बने  गुलाम   समाज ।।4।।
वे नहि चाहते थे श्रमिकों की, लुटे  दुनिया  लाज।।5।।
वे नहि चाहते थे मन्त्री की,सजधज,चैन-मिजाज।।6।।
कहता तकड्या,वे चाहते थे- देश  रहे  सिरताज ।।7।।