भगवान ! मुझे मरना दे, नहि देख सकूँ मैं जादे

(तर्ज : विश्वासपे क्‍यों बैठा है ?...)
भगवान ! मुझे मरना दे, नहि देख सकूँ मैं जादे ।
इस भारत की दैना को, या तो फिर दुःख मिटा  दे ।।टेक ॥
यहि कहता था आखिर गांधी, गर अब जीवित होता।
इतनी बिगड़ गयी है अपने-अपने में ही जनता।।
यह पाप न धरती सम्हाले,बस नागके जैसी डोले।
मर गये कई, घर टूटे, या तो यह ठीक बिठा दे ।। 1।।
भारत में एक ग्राम नहीं है, जहाँ न पक्ष पडा हो।
आपसभें ही कट मरते, ज्यो बाज से बाज लडा हो।।
गरिबों की बडी हे दैना,क्या कहना? किससे कहना?
वे लडें जो लडनेवाले, क्यों सज्जन को भी कटा दें ?।।2 ।।
धर्म नहीं, सत्कर्म नहीं, हरोज खून करते हैं।
दूध में पानी, नाज में कंकर, चोर जेब भरते हैं।।
कहे तुकड्या आँधी लाऊँ, मैं भी मरकर जी जाऊँ ।
कुछ क्रान्ति करूँ लगता है, इस जोशकी लाट उठा दे।।3।।