धनका भरोसा नहीं है। जिसने-जिसने धनको पाया,उसने घरको झगडे लाया
(तर्ज : चन्दा जा जारे जारे जा...)
धनका भरोसा नहीं है।
जिसने-जिसने धनको पाया,उसने घरको झगडे लाया।
सुनीये बात ये सही है ।।टेक॥
सादा जीवन मोल मजूरी, श्रध्दा - भक्ति उनमें पूरी ।
संतनकी गावे बलिहारी, वृत्ति कभू नहीं होत विकारी ।
जब नीतीमें फरक पड़ेगा, सत्की बात खो गयी है ।
धनका भरोसा नहीं है ।।1॥
धनके पीछे मन अभिमानी, सत्ता-चोरी-जारी बिरानी ।
दिन-गरीबों को कर हैरानी ,बात किसीकी भी नहिं मानी ।
चारों ओर बढ़े शैतानी, तनकी सुध ना रही है।
धनका भरोसा नहीं है।।2॥
जब हत्बल होवेगी काया, गुण नहिं आये लाख कराया |
दिलके दिलमें फिर पछताया, मेरा पाप भुगत नहीं पाया।
सब तनमनकी बिगडी माया, अब तो शेष क्या रही है।
धनका भरोसा नहीं है ।।3॥
बडे बडे थे राजा जोगी, समय गया फिर हो गये रोगी ।
कुछ तो भटके, भये बिरागी, खोया धन ,अब माँगे चुंगी ।
तुकड्यादास कहे उनके घर,दीन भी तो कहीं नहीं है ।
धनका भरोसा नहीं है ।।4।।