गगनके बीचमें बाजा, कोई बिरलाही सुनता है
( तर्ज : अगर है शौक मिलनेका... )
गगनके बीचमें बाजा, कोई बिरलाही सुनता है ।।टेक।।
सुनाते बात बातोंसे, न देखा कोई जातोंसे ।
गुरुका पुत्र आँतोंसे, सदा अलमस्त धुनता है ।।१।।
चले दशनाद पलछिनमें, न देखे कोई निसदिन में ।
पड़े सब द्वैतके रिणमें, वली दिलदार गुनता है ।।२।।
उपर चढ नीचे आजावे, उसी अजपाके गुण गावे ।
जो दिलके मैलको धोवे, सदा रंग लाल छनता है ।।३।।
कहे तुकड्या जले धूनी, बनोंमें है बसा मुनी ।
चली वर्षा जहाँ भीनी, वही रस चाख रूँधता है ।।४।।