मेरी अँखियोंके तारे तुम हो! मेरे दिलके सहारे तुम हो।

(तर्ज: जरा सामने तो आवो.... )

मेरी अँखियोंके तारे तुम हो! मेरे दिलके सहारे तुम हो।
ये तन-मन निछावर तुमपे, जीवनके उजारे तुम हो ॥टेक॥
जब मैने तुमको ध्यानसे माना,कोई अलग नहिं कर सकता।
जैसे दीपकसे धूर हटाकर, कोई उधर नहिं धर सकता ।।
मेरे मनकी मूर्ति तुम हो ! निर्वाणकी पूर्ति तुम हो!
ये तन-मन निछावर तुमपे जीवन के उजारे तुम हो ।।1॥
जब मैने सारी पढी किताबें, यही सार पाया उनमें।तीरथ-मन्दर-जाकर देखा, यहि अनुभव आया उनमें।।
तुकड्याके पियारे तुम हो! घटघटके नजारे तुम हो!
ये तन-मन निछावर तुमपे, जीवनके उजारे तुम हो।।2।